गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011
व्यंग--OCT2011
एक बुजुर्ग;क्या जमाना आ गया है,नव युवाओ के बदन पर कपडे,घटते जा रहे हैं. फैशन के नाम पर अश्लीलता बढती जा रही है सब बेशर्म होते जा रहे हैं.
नवयुवक;अंकल क्या इन्सान कपडे पहन कर पैदा होता है, अब यदि कोई प्राकृतिक अवस्था में रहना चाहता है तो गलत क्या हुआ?
बुजुर्ग; परन्तु बेटा समाज की भी अपनी मर्यादा होती है, अतः समाज में रहने के लिए बदन को ढकना ही चाहिए.
नवयुवक;अंकल ,मुझे तो याद नहीं आता कभी किसी लड़के या लड़की को बिना कपडे पहने घूमते देखा हो .फिर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?मुझे तो ऐसा लगता है हमारी सोच में ही कुछ खोट है. हमारे आत्म संयम में ही कमी है. आत्मनियंत्रण के अभाव में हम नई पीढ़ी को दोष देते हैं. उसके पहनावे पर ऊँगली उठाते हैं. कभी किसी कुत्ते,बिल्ली,गाय भैंस के निर्वस्त्र घुमने में हमें कोई अश्लीलता नहीं दिखाई देती , क्यों? फिर जैन मुनि भी निर्वस्त्र रहते हैं?परन्तु उनके शिष्यों कोई आपत्ति नहीं होती.
बुजुर्ग; बेटा तुम्हारी सोच सही दिशा में जा रही है. धन्य हो तुम्हारा आधुनिकतावाद.
--
*SATYA SHEEL AGRAWAL*
(blogger)*
शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011
विकसित देश और मानवता .
.
आज विश्व में जो भी अविकसित देश हैं ,या गरीब देश हैं , उनके पिछड़े पन के लिए विकसित देश अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते .विश्व में कुल उत्पादन के अस्सी प्रतिशत का उपभोग विकसित देशों द्वारा कियां जाता है ,जो विश्व की जनसँख्या का सिर्फ बीस प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं .विश्व की शेष अस्सी प्रतिशत आबादी मात्र बीस प्रतिशत उत्पादन का उपभोग कर पाती है .
जो आज विकसित देश हैं अधिकांश ने ,वर्तमान के अविकसित देशों को गुलाम BANAKAR सैंकड़ों वर्ष शासन किया ओर इन देशों की धन सम्पदा को लूट कर अपने देश को समृद्ध कर लिया जो आज विकसित देशों की श्रेणी में गिने जाते हैं .तथाकथित विकसित देश आज भी गरीब देशों को आपस में लड़ा कर अपने हथियार बेचते हैं एवं अपने आर्थिक हितों का पोषण करते हैं .साथ ही गरीब देशों को विकसित देशों की श्रेणी में आने से रोकते हैं .
बिना किसी वजह के इराक को कुचल डालना ,अफगानिस्तान पर कब्ज़ा कर लेना विकसित देशों के प्रतिनिधि अमेरिका की चल थी , जो खड़ी के देशों में अपना दवाब बनाये रखना ओर अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ती की कवायद थी .
आज भारत ओर चीन की उन्नति विकसित देशों की आँखों में चुभ रही है .क्योंकि वे कभी पूरी मानवता के हित में न सोच कर सिर्फ अपने देश के लिए सोचते हैं जो सरासर मानवता के प्रति अपराध है..
आज विश्व में जो भी अविकसित देश हैं ,या गरीब देश हैं , उनके पिछड़े पन के लिए विकसित देश अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते .विश्व में कुल उत्पादन के अस्सी प्रतिशत का उपभोग विकसित देशों द्वारा कियां जाता है ,जो विश्व की जनसँख्या का सिर्फ बीस प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं .विश्व की शेष अस्सी प्रतिशत आबादी मात्र बीस प्रतिशत उत्पादन का उपभोग कर पाती है .
जो आज विकसित देश हैं अधिकांश ने ,वर्तमान के अविकसित देशों को गुलाम BANAKAR सैंकड़ों वर्ष शासन किया ओर इन देशों की धन सम्पदा को लूट कर अपने देश को समृद्ध कर लिया जो आज विकसित देशों की श्रेणी में गिने जाते हैं .तथाकथित विकसित देश आज भी गरीब देशों को आपस में लड़ा कर अपने हथियार बेचते हैं एवं अपने आर्थिक हितों का पोषण करते हैं .साथ ही गरीब देशों को विकसित देशों की श्रेणी में आने से रोकते हैं .
बिना किसी वजह के इराक को कुचल डालना ,अफगानिस्तान पर कब्ज़ा कर लेना विकसित देशों के प्रतिनिधि अमेरिका की चल थी , जो खड़ी के देशों में अपना दवाब बनाये रखना ओर अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ती की कवायद थी .
आज भारत ओर चीन की उन्नति विकसित देशों की आँखों में चुभ रही है .क्योंकि वे कभी पूरी मानवता के हित में न सोच कर सिर्फ अपने देश के लिए सोचते हैं जो सरासर मानवता के प्रति अपराध है..
बुधवार, 12 अक्टूबर 2011
लिव इन रेलाशन्शिप
भारतीय समाज में आज भी विवाह से पूर्व किसी भी लड़के एवं लड़की का घुलना मिलना या शरीरिक संपर्क बनाना अमान्य है .इसी प्रकार विवाह पश्चात् जीवन साथी के अतिरिक्त किसी अन्य के साथ शारीरिक संसर्ग की इजाजत नहीं है .परन्तु आधुनिक चलन में पुय्रुष महिला बिना विवाह किये अर्थात कानूनी या सामाजिक मान्यता प्राप्त किये बिना साथ साथ रहने लगते हैं .जिसे लिव इन रेलाशन्शिप का नाम दिया जाता है .लिव इन रेलाशन्शिप अल्प अवधि का हो अथवा दीर्घावधि का या आजीवन , सामाजिक रूप से मान्य नहीं है .बिना कोर्ट मेरिज पंजीयन के साथ साथ रहना कानूनन भी मान्य नहीं है .परन्तु इस प्रकार के केसों में जब कोई धोके का शिकार होता है तो लिव इन रेलाशन्शिप को कानूनी मान्यता दिए जाने की मांग की जाती है .
लिव इन रेलाशन्शिप को दो प्रकार से देखा जा सकता है ,
प्रथम ; जब युवक युवती बिना विवाह किये साथ साथ रहने लगते हैं ,और अपना परिवार बढ़ाते हैं एवं घ्राहस्थी की जिम्मेदारियों को निभाते हैं .
द्वितीय ; जब अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में कोई स्त्री या पुरुष अपने जीवन साथी से बिछुड़ जाता है ,तो अपने शेष जीवन को किसी के साथ निभने के लिए विपरीत लिंगी के साथ बिना विवाह किये साथ रहने का निश्चय करते हैं .ऐसे युगल अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से पहले ही मुक्त हो चुके होते हैं .अतः कोई सामाजिक या कानूनी आक्षेप नहीं आता . उनकी लिव इन रेलाशंशैप शारीरिक आकर्षण के कारण या शारीरिक संबंधों के लिए नहीं होती .उनका मकसद सिर्फ आपसी सहयोग करना होता है .इस प्रकार के सम्न्धों की कानूनी मान्यता के न होते हुए भी सामाजिक रूप से अनैतिक नहीं माना जाता .बल्कि ऐसे संबंधों के कारण बुजुर्ग के चेहरे पर संतोष के भाव देख कर परिवार और समाज को ख़ुशी का अनुभव होता है .
प्रस्तुत लेख में हमारा मुख्य उद्देश्य युवावस्था में ’ लिव इन रेलाशन्शिप’ है .जब एक युवक एवं युवती एक दूसरे को पसंद करते हैं और बिना कानूनी या सामाजिक प्रक्रिया अपनाये साथ साथ रहने लगते हैं .आधुनिक युग में जब महिलाएं शिक्षित एवं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गयी हैं , लिव इन रेलाशन्शिप का चलन बढ़ने लगा है . परिवार नियोजन सम्बन्धी सुविधाएँ हो जाने के कारण महिलाएं अधिक निर्भय हो गयी हैं ,उन्हें किसी प्रकार की स्वच्छंदता से कोई सामाजिक प्रताड़ना का भय नहीं रह गया है .आज विवाह पूर्व एवं विवाहेत्तर संबंधों से सामाजिक बंधन घटते जा रहे हैं .जिसने हमारी संस्कृति पर करारी चोट की है . इसी प्रकार के अवैध संबधों का नया संस्करण है ,”लिव इन रेलाशन्शिप .”इस नए संस्करण में युवक युवती एक दूसरे पर पूर्णतया समर्पित हैं ,गृहस्थी की सभी जिम्मदारियां भी निभाते हैं ,परन्तु सामाजिक या कानूनी बंधन में बंधने से कतराते हैं ,क्यों ?आधुनिक चलन की आड में आधुनिकता कम धोखेबाजी की संभावना अधिक रहती है .आखिर सब कुछ समर्पण के पश्चात् बंधन से परहेज क्यों ? कहीं कोई पार्टनर अपने गलत इरादे तो नहीं पाले हुए है ?हो सकता है कोई युवक किसी युवती के साथ आधुनिकता का झांसा देकर साथ रहे ,सम्बन्ध बनाये और फिर कभी भी छोड़ कर किसी अन्य युवती के साथ रहने लगे ऐसी अवस्था में युवती एवं उसके बच्चों को कोई कानूनी एवं सामाजिक संरक्षण प्राप्त नहीं होता . इसी प्रकार इस सम्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कोई चालक युवती किसी धनवान या हाई प्रोफाईल युवक को अपने प्रेमजाल में फंसकर लिव इन रेलाशन्शिप में कुछ समय बिताने के पश्चात् उसका समस्त धन -दौलत लूटकर ले जाय या अवैध संबंधों की दुहाई देते हुए लड़के के सम्मान को चोट पहुंचाए ,उसे ब्लेकमेल करे ,अनेक आरोप लगा कर कानूनी प्रक्रिया में घसीटे और उसका जीवन कलुषित कर दे .
कहने का तात्पर्य यह है लिव इन रेलाशन्शिप के अवैध चलन में काफी खतरे मौजूद हैं .यह भी विचारणीय विषय है की जब दोनों एक दूसरे पर समर्पित हैं तो कानूनी या सामाजिक बंधनों को अपनाने से परहेज क्यों ?क्या यह उनकी ईमानदारी ,बफदारी के ऊपर प्रश्न चिन्ह नहीं है ? संभव है किसी युगल के रिश्ते को अपनाने में सामाजिक अड़चन हो तो भी कोर्ट मेरिज कर कानूनी संरक्षण तो प्राप्त किया जा सकता है .इस प्रकार से दोनों पार्टनर को अपने सुरक्षित भवष्य की सुनिश्चितता तो प्राप्त होती है . यदि उन्हें सम्भावना लगती है की वे आजीवन साथ नहीं रह पाएंगे तो भी तलाक का विकल्प मौजूद रहेगा .
बेनामी रिश्ते देश की संस्कृति पर आघात करते हैं ,देश में सामाजिक विकृतियाँ उत्पन्न करते हैं .सामाजिक ताने बने को छिन्न भिन्न करते हैं .ऐसी स्तिथि में परिवार का अस्तित्व लग - भाग समाप्त हो जाता है . किसी असहज स्तिथि में उसे कानूनी या सामाजिक संरक्षण नहीं मिल पाता . यदि समाज बेनामी रिश्तों को मान्यता देने लगे तो मानव सभ्यता और जंगलराज में कोई अंतर नहीं रह जायेगा .
मानव समाज को निरंतर विकास करते रहने के लिए , समाज को सभ्यता के दायरे में रखने के लिए कानूनी नियंत्रण आवश्यक है .अतः प्रत्येक सम्बन्ध को विधिवत मान्यता देना आवश्यक है .प्रत्येक इन्सान के सुरक्षित भविष्य की गारंटी है . मानवीय विकास के लिए आवश्यक भी है . जब हमें अधिकार ,सुविधाएँ ,संसाधन चाहिए तो कर्त्तव्य एवं बंधन भी निभाने पड़ेंगे .
यदि “लिव इन रेलाशन्शिप ”को मान्यता दे दी जाय तो सामाजिक अपराध को छूट दे देने के समान होगा , जो स्वास्थ्य एवं सभ्य समाज के लिए उचित नहीं हो सकता .
Satya sheel agrawal
लिव इन रेलाशन्शिप को दो प्रकार से देखा जा सकता है ,
प्रथम ; जब युवक युवती बिना विवाह किये साथ साथ रहने लगते हैं ,और अपना परिवार बढ़ाते हैं एवं घ्राहस्थी की जिम्मेदारियों को निभाते हैं .
द्वितीय ; जब अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में कोई स्त्री या पुरुष अपने जीवन साथी से बिछुड़ जाता है ,तो अपने शेष जीवन को किसी के साथ निभने के लिए विपरीत लिंगी के साथ बिना विवाह किये साथ रहने का निश्चय करते हैं .ऐसे युगल अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से पहले ही मुक्त हो चुके होते हैं .अतः कोई सामाजिक या कानूनी आक्षेप नहीं आता . उनकी लिव इन रेलाशंशैप शारीरिक आकर्षण के कारण या शारीरिक संबंधों के लिए नहीं होती .उनका मकसद सिर्फ आपसी सहयोग करना होता है .इस प्रकार के सम्न्धों की कानूनी मान्यता के न होते हुए भी सामाजिक रूप से अनैतिक नहीं माना जाता .बल्कि ऐसे संबंधों के कारण बुजुर्ग के चेहरे पर संतोष के भाव देख कर परिवार और समाज को ख़ुशी का अनुभव होता है .
प्रस्तुत लेख में हमारा मुख्य उद्देश्य युवावस्था में ’ लिव इन रेलाशन्शिप’ है .जब एक युवक एवं युवती एक दूसरे को पसंद करते हैं और बिना कानूनी या सामाजिक प्रक्रिया अपनाये साथ साथ रहने लगते हैं .आधुनिक युग में जब महिलाएं शिक्षित एवं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गयी हैं , लिव इन रेलाशन्शिप का चलन बढ़ने लगा है . परिवार नियोजन सम्बन्धी सुविधाएँ हो जाने के कारण महिलाएं अधिक निर्भय हो गयी हैं ,उन्हें किसी प्रकार की स्वच्छंदता से कोई सामाजिक प्रताड़ना का भय नहीं रह गया है .आज विवाह पूर्व एवं विवाहेत्तर संबंधों से सामाजिक बंधन घटते जा रहे हैं .जिसने हमारी संस्कृति पर करारी चोट की है . इसी प्रकार के अवैध संबधों का नया संस्करण है ,”लिव इन रेलाशन्शिप .”इस नए संस्करण में युवक युवती एक दूसरे पर पूर्णतया समर्पित हैं ,गृहस्थी की सभी जिम्मदारियां भी निभाते हैं ,परन्तु सामाजिक या कानूनी बंधन में बंधने से कतराते हैं ,क्यों ?आधुनिक चलन की आड में आधुनिकता कम धोखेबाजी की संभावना अधिक रहती है .आखिर सब कुछ समर्पण के पश्चात् बंधन से परहेज क्यों ? कहीं कोई पार्टनर अपने गलत इरादे तो नहीं पाले हुए है ?हो सकता है कोई युवक किसी युवती के साथ आधुनिकता का झांसा देकर साथ रहे ,सम्बन्ध बनाये और फिर कभी भी छोड़ कर किसी अन्य युवती के साथ रहने लगे ऐसी अवस्था में युवती एवं उसके बच्चों को कोई कानूनी एवं सामाजिक संरक्षण प्राप्त नहीं होता . इसी प्रकार इस सम्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कोई चालक युवती किसी धनवान या हाई प्रोफाईल युवक को अपने प्रेमजाल में फंसकर लिव इन रेलाशन्शिप में कुछ समय बिताने के पश्चात् उसका समस्त धन -दौलत लूटकर ले जाय या अवैध संबंधों की दुहाई देते हुए लड़के के सम्मान को चोट पहुंचाए ,उसे ब्लेकमेल करे ,अनेक आरोप लगा कर कानूनी प्रक्रिया में घसीटे और उसका जीवन कलुषित कर दे .
कहने का तात्पर्य यह है लिव इन रेलाशन्शिप के अवैध चलन में काफी खतरे मौजूद हैं .यह भी विचारणीय विषय है की जब दोनों एक दूसरे पर समर्पित हैं तो कानूनी या सामाजिक बंधनों को अपनाने से परहेज क्यों ?क्या यह उनकी ईमानदारी ,बफदारी के ऊपर प्रश्न चिन्ह नहीं है ? संभव है किसी युगल के रिश्ते को अपनाने में सामाजिक अड़चन हो तो भी कोर्ट मेरिज कर कानूनी संरक्षण तो प्राप्त किया जा सकता है .इस प्रकार से दोनों पार्टनर को अपने सुरक्षित भवष्य की सुनिश्चितता तो प्राप्त होती है . यदि उन्हें सम्भावना लगती है की वे आजीवन साथ नहीं रह पाएंगे तो भी तलाक का विकल्प मौजूद रहेगा .
बेनामी रिश्ते देश की संस्कृति पर आघात करते हैं ,देश में सामाजिक विकृतियाँ उत्पन्न करते हैं .सामाजिक ताने बने को छिन्न भिन्न करते हैं .ऐसी स्तिथि में परिवार का अस्तित्व लग - भाग समाप्त हो जाता है . किसी असहज स्तिथि में उसे कानूनी या सामाजिक संरक्षण नहीं मिल पाता . यदि समाज बेनामी रिश्तों को मान्यता देने लगे तो मानव सभ्यता और जंगलराज में कोई अंतर नहीं रह जायेगा .
मानव समाज को निरंतर विकास करते रहने के लिए , समाज को सभ्यता के दायरे में रखने के लिए कानूनी नियंत्रण आवश्यक है .अतः प्रत्येक सम्बन्ध को विधिवत मान्यता देना आवश्यक है .प्रत्येक इन्सान के सुरक्षित भविष्य की गारंटी है . मानवीय विकास के लिए आवश्यक भी है . जब हमें अधिकार ,सुविधाएँ ,संसाधन चाहिए तो कर्त्तव्य एवं बंधन भी निभाने पड़ेंगे .
यदि “लिव इन रेलाशन्शिप ”को मान्यता दे दी जाय तो सामाजिक अपराध को छूट दे देने के समान होगा , जो स्वास्थ्य एवं सभ्य समाज के लिए उचित नहीं हो सकता .
Satya sheel agrawal
रविवार, 9 अक्टूबर 2011
insaniyat aur dharm-----इंसानियत का धर्म
हमारे देश में प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म अपने विचारों को प्रसारित एवं प्रचारित करने की पूरी स्वतंत्रता है,विभिन्न धर्मों के व्यापक प्रचार एवं प्रसार के बावजूद इमानदारी,सच्चाई,शालीनता,अहिंसा,सहिष्णुता,जैसे गुणों का सर्वथा अभाव है। जिसने अपने देश में अराजकता ,अत्याचार,चोरी,डकैती,हत्या जैसे अपराधों का ग्राफ बढा दिया है.दिन प्रतिदिन नैतिक पतन हो रहा है.उसका कारण यह है की हम धर्म को तो अपनाते
हैं परन्तु धर्मो द्वारा बताये गए आदर्शों को अपने व्यव्हार में नहीं अपनाते। सभी धर्मों के मूल तत्व इन्सनिअत को भूल जाते हैं,और अवांछनीय व्यव्हार को अपना लेते हैं।
यदि हम किसी धर्म का अनुसरण न भी करें और इन्सनिअत को अपना लें ,इन्सनिअत को अपने दैनिक व्यव्हार में ले आए तो न सिर्फ अपने समाज,अपने देश, बल्कि पूरे विश्व में सुख समृधि एवं विकास की लहर पैदा कर सकते हैं.
हैं परन्तु धर्मो द्वारा बताये गए आदर्शों को अपने व्यव्हार में नहीं अपनाते। सभी धर्मों के मूल तत्व इन्सनिअत को भूल जाते हैं,और अवांछनीय व्यव्हार को अपना लेते हैं।
यदि हम किसी धर्म का अनुसरण न भी करें और इन्सनिअत को अपना लें ,इन्सनिअत को अपने दैनिक व्यव्हार में ले आए तो न सिर्फ अपने समाज,अपने देश, बल्कि पूरे विश्व में सुख समृधि एवं विकास की लहर पैदा कर सकते हैं.
गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011
भ्रष्टाचार बिन सब सून (व्यंग)
पूरा देश श्री अन्ना हजारे जी के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरोध में खड़ा हो चुका है.जिससे स्पष्ट है आज देश का प्रत्येक नागरिक भ्रष्टाचार रुपी राक्षस से त्रस्त हो चुका है.आजादी के पश्चात् भ्रष्टाचार को समाप्त करने के अनेक प्रयास हुए,परन्तु सभी प्रयास कागजी शेर साबित हुए. भ्रष्टाचार सुरसा की भांति बढ़ता ही चला गया .आज भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं की भ्रष्टाचार के बिना सोचना भी हास्यास्पद लगता है.हमें कल्पना करना भी मुश्किल लगता है .कुछ व्यंगात्मक कल्पनाएँ प्रस्तुत हैं.; यदि हम कल्पना करें की देश के सभी सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार ख़त्म हो चुका है .कैसी स्तिथि होगी सरकारी कार्यालयों की . आज प्रत्येक सरकारी कर्मी रुपी इंजन रिश्वत रुपी इंधन से चलता है .परन्तु जब भ्रष्टाचार द्वारा आमदनी का स्रोत समाप्त हो चुका होगा तो सरकारी कर्मी काम ही क्यों करेगा? जब कर्मी की कार्यालय में उपस्थिति दर्ज हो गयी तो उसका वेतन पक्का हो गया .वह काम करे या न करे नौकरी से तो निकाला नहीं जा सकता ,अधिक से अधिक उसका स्थानांतरण किया जा सकता है.उसकी भी उसे चिंता क्यों होगी जब कोई भी पोस्ट मलाईदार होगी ही नहीं. उसे तो वेतन मात्र से काम चलाना है वो तो कहीं भी चला लेगा.ऐसी निष्क्रियता की स्तिथि में आपके सरकारी कार्य कैसे निपट पाएंगे ?भ्रष्टाचार हटाने के पश्चात् यदि हम सरकारी कर्मी की कार्य के प्रति उदासीनता,निष्क्रियता,लापरवाही को नियंत्रित नहीं कर पाते हैं तो जनता को क्या भुगतना पड़ेगा ? कुछ व्यंगात्मक कल्पनाएँ प्रस्तुत हैं.;
अब जरा सोचिये भ्रष्टाचार के बिना पूरी व्यवस्था पंगु नहीं हो जाएगी?, आखिर देश का विकास कैसे हो पायेगा? सोचना होगा भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान आत्मघाती तो न हो जायेगा? आखिर भ्रष्टाचार के बिन सब सून लगेगा. अतः भ्रष्टाचार को बनाये रखिये इसको हटाने की गलती न करें, अनर्थ हो जायेगा..मेरा प्रस्ताव मानने के लिए धन्यवाद . -- *SATYA SHEEL AGRAWAL* |
शनिवार, 1 अक्टूबर 2011
ओर भी रूप हैं भ्रष्टाचार के
आज जब भी हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं,तो अक्सर सरकारी कर्मचारियों द्वारा ली जाने वाली रिश्वत को ही लक्ष्य मानते हैं या समझते है. वास्तव में भ्रष्टाचार का रूप काफी व्यापक है. भ्रष्टाचार के मूल अर्थ है भ्रष्ट आचार अर्थात कोई भी अनैतिक व्यव्हार, गैरकानूनी व्यव्हार भ्रष्टाचार ही होता है. अतः सिर्फ नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाकर वांछित परिणाम प्राप्त नहीं किये जा सकते .आम जनता को भी अपने व्यव्हार में ईमानदारी,पारदर्शिता,शुचिता,मानवता जैसे गुणों को अपनाना होगा. आईये देखते हैं कैसे;
1. उचित मार्ग अर्थात नैतिकता और आदर्शों पर चलने वाले व्यक्ति को साधारणतया हम मूर्ख कहते है, अव्यवहारिक कहते हैं,कभी कभी बेचारा भी कहते हैं.
2. कोई भी सरकारी या गैरसरकारी कर्मचारी अपने कार्य के प्रति उदासीन रहता है ,जनता की समस्या को सुनने,समझने समाधान करने में कोई रूचि नहीं रखता.
3. दुकानदार नकली वस्तुओं को असली बता कर बेचता है,और अप्रत्याशित कमाई करता है.
4. उत्पादक नकली वस्तुओं या मिलावटी वस्तुओं का निर्माण करता है,उन्हें असली ब्रांड नाम से पैक करता है.
5. कोई भी जब दहेज़ की मांग पूरी न होने पर बहू को प्रताड़ित करता है उसके साथ हिंसक व्यव्हार करता है.
6. जब कोई व्यक्ति किसी महिला के साथ छेड़खानी करता है, तानाकशी करता है.या दुर्व्यवहार करता है.
7. ऑफिस में,व्यवसाय में,कारोबार में कार्यरत मातहत महिला की विवशता का लाभ उठाते हुए उसका शारीरिक या मानसिक शोषण किया जाता है.
8. समाज में किसी के भी साथ अन्याय,दुराचार,अत्याचार किया जाता है.
9. चापलूसी कर कोई नौकरी हड़पना,या फिर अपने प्रोमोशन का मार्ग प्रशस्त करना भी भ्रष्टाचार का ही एक रूप है.
10. यदि कोई व्यक्ति योग्य है ,सक्षमहै ,कर्मठ है,बफादार है अर्थात सर्वगुन्संपन्न है परन्तु चापलूस नहीं है, इस कारण उसे प्रताड़ित किया जाना,दण्डित करना,अपमानित करना भी क्या भ्रष्टाचार का हिस्सा नहीं है?
11. अपने छोटे से लाभ की खातिर किसी दलाल,कमीशन एजेंट,व्यापारी द्वारा ग्राहक को दिग्भ्रमित करना और ग्राहक की बड़ी पूँजी को दांव पर लगा देना क्या भ्रष्टाचार का ही रूप नहीं है?
12. डाक्टर,इंजीनयर ,मिस्त्री,अपने लाभ के लिए अनाप शनाप बिल बना कर ग्राहक के साथ अन्याय करते हैं.
13. असंयमित आहार विहार अथवा असंतुलित खान पान द्वारा विभिन्न बिमारियों को आमंत्रित कर लेना भी भ्रष्टाचार का ही रूप है स्वयं अपने साथ अन्याय है .मदिरा पान,बीडी सिगरेट व अन्य नशीले पदार्थों का सेवन अपने शरीर पर अत्याचार है, भ्रष्टाचार है.
--
*SATYA SHEEL AGRAWAL*
1. उचित मार्ग अर्थात नैतिकता और आदर्शों पर चलने वाले व्यक्ति को साधारणतया हम मूर्ख कहते है, अव्यवहारिक कहते हैं,कभी कभी बेचारा भी कहते हैं.
2. कोई भी सरकारी या गैरसरकारी कर्मचारी अपने कार्य के प्रति उदासीन रहता है ,जनता की समस्या को सुनने,समझने समाधान करने में कोई रूचि नहीं रखता.
3. दुकानदार नकली वस्तुओं को असली बता कर बेचता है,और अप्रत्याशित कमाई करता है.
4. उत्पादक नकली वस्तुओं या मिलावटी वस्तुओं का निर्माण करता है,उन्हें असली ब्रांड नाम से पैक करता है.
5. कोई भी जब दहेज़ की मांग पूरी न होने पर बहू को प्रताड़ित करता है उसके साथ हिंसक व्यव्हार करता है.
6. जब कोई व्यक्ति किसी महिला के साथ छेड़खानी करता है, तानाकशी करता है.या दुर्व्यवहार करता है.
7. ऑफिस में,व्यवसाय में,कारोबार में कार्यरत मातहत महिला की विवशता का लाभ उठाते हुए उसका शारीरिक या मानसिक शोषण किया जाता है.
8. समाज में किसी के भी साथ अन्याय,दुराचार,अत्याचार किया जाता है.
9. चापलूसी कर कोई नौकरी हड़पना,या फिर अपने प्रोमोशन का मार्ग प्रशस्त करना भी भ्रष्टाचार का ही एक रूप है.
10. यदि कोई व्यक्ति योग्य है ,सक्षमहै ,कर्मठ है,बफादार है अर्थात सर्वगुन्संपन्न है परन्तु चापलूस नहीं है, इस कारण उसे प्रताड़ित किया जाना,दण्डित करना,अपमानित करना भी क्या भ्रष्टाचार का हिस्सा नहीं है?
11. अपने छोटे से लाभ की खातिर किसी दलाल,कमीशन एजेंट,व्यापारी द्वारा ग्राहक को दिग्भ्रमित करना और ग्राहक की बड़ी पूँजी को दांव पर लगा देना क्या भ्रष्टाचार का ही रूप नहीं है?
12. डाक्टर,इंजीनयर ,मिस्त्री,अपने लाभ के लिए अनाप शनाप बिल बना कर ग्राहक के साथ अन्याय करते हैं.
13. असंयमित आहार विहार अथवा असंतुलित खान पान द्वारा विभिन्न बिमारियों को आमंत्रित कर लेना भी भ्रष्टाचार का ही रूप है स्वयं अपने साथ अन्याय है .मदिरा पान,बीडी सिगरेट व अन्य नशीले पदार्थों का सेवन अपने शरीर पर अत्याचार है, भ्रष्टाचार है.
--
*SATYA SHEEL AGRAWAL*
शुक्रवार, 23 सितंबर 2011
क्यों उजागर हो जाते हैं घोटाले?
यद्यपि 'सूचना का अधिकार' के अंतर्गत घोटाले खुलने के पूरे आसार बन गए हैं.आज कल घोटले खुलना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है.परन्तु घोटाले तो आजादी के बाद से ही खुलते रहे हैं .परन्तु जब पूरा सिस्टम भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है ,आखिर इन घोटालों को जनता के सामने लाता कौन है क्यों उजागर हो जाते हैं घोटाले?
दरअसल घोटाले तो नित्य होते ही रहते हैं सब कुछ शांत रहता है, जब तक बन्दर बाँट उचित ढंग से होती रहती है. जब भ्रष्टाचार से प्राप्त रकम की बंदरबांट में कहीं घोटाला हो जाता है अर्थात घोटाले में घोटाला हो जाता है,किसी अधिकारी या मंत्री को उसकी हैसियत अनुसार उसका हक़ नहीं दिया जाता तो असंतुष्ट व्यक्ति सारा का सारा रायता बिखेर देता है.और जनता के समक्ष घोटाला आ जाता है.
तत्पश्चात एक नया खेल शुरू होता है,शासन की ओर से जाँच अजेंसी को केस सोंप दिया जाता है. फिर अपने प्रभाव से रिपोर्ट को लाने में देरी की जाती है, बार बार रपोर्ट पेश करने के लिए समय बढ़ाने का नाटक किया जाता है. उसके पश्चात् मुकदमें में वर्षों लगा दिया जाते है. इस बीच केस को कमजोर करने के लिए सारे हथकंडे अपनाये जाते है. सबूतों को नष्ट किया जाता है.आखिर में आरोपी निर्दोष साबित हो जाता है. केस रफा दफा हो जाता है. यदि केस में कोई अनियमितता के तथ्य थे ही नहीं तो जाँच एजेंसियों ने केस दर्ज ही क्यों किया?क्यों बड़े बड़े अधिकारीयों मंत्रियों पर अनेक केस चलने के बाद भी कोई दोषी सिद्ध नहीं हो सका ?
क्या इस वास्तविकता में कोई संदेह रह जाता है की- भ्रष्टाचार करते पकडे गए और भ्रष्टाचार द्वारा ही साफ बच गए?और जनता देखती ही रह गयी.
<script async
src="//pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js"></script>
<!-- s.s.agrawal -->
<ins class="adsbygoogle"
style="display:block"
data-ad-client="ca-pub-1156871373620726"
data-ad-slot="2252193298"
data-ad-format="auto"></ins>
<script>
(adsbygoogle = window.adsbygoogle ||
[]).push({});
</script>
|
शुक्रवार, 16 सितंबर 2011
भ्रष्टाचार के तीन स्रोत
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की बात करने से पूर्व भ्रष्टाचार की उत्पत्ति के कारण अथवा भ्रष्टाचार के स्रोतों का अध्ययन करना भी आवश्यक है. ताकि उन स्रोतों पर कुठाराघात किया जा सके और देश को भ्रष्टाचार मुक्त किया जा सके. सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाकर ही इस बुराई से लड़ना संभव होगा.भ्रष्टाचार के निम्नलिखित तीन मुख्य स्रोत हैं .
प्रथम;सरकारी कर्मी,सरकारी अधिकारी अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए, उसे मिली निर्णय शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए, आपके सही काम को भी गलत सिद्ध करने की धमकी देता है, और उसके बदले में रिश्वत की मांग करता है,या फिर आपके काम को अनावश्यक रूप से देर करने बात करता है ,जल्दी काम करवाने के लिए सेवा पानी की जरूरत बताता है.इस प्रकार के भ्रष्टाचार में सरकारी खाजने को कोई हानि तो नहीं पहुँचती परन्तु आपकी जेब पर डाका पड़ता है और सही काम के लिए घूस देना आपके लिए कुछ ज्यादा ही कष्ट दायक होता है.क्योंकि आपको कानून सम्मत काम के लिए भी जेब ढीली करने की मजबूरी जो है.
द्वितीय ;इस स्रोत द्वारा आपकी जेब पर तो डाका डाला ही जाता है,परन्तु सरकारी राजकोष को भी क्षति पहुंचाईजाती है,अर्थात या राजस्व को आने से रोका जाता है या फिर राजस्व को आवश्यकता से अधिक खर्च कर राजकोष को नुकसान पहुँचाया जाता है.लाभान्वित होते हैं आप या सरकारी कर्मी.इस प्रकार के भ्रष्टाचार में सरकारी अधिकारी,सत्ताधारी नेता राजकोष को चूना लगाकर अपने खजाने भरते हैं.जनता की गाढ़ी कमाई से प्राप्त टेक्स को चंद लोग चाट कर जाते हैं.और जनता को विकास के नाम पर मिलता है सिर्फ आश्वासन .भ्रष्टाचार के इस स्रोत को विशालतम स्रोत कहा जा सकता है जिसके द्वारा हजारों करोड़ का फटका लगता है .जैसे किसी टैक्स की बसूली करते समय ताक्स्दाता को लाभ पहुँचाना,किसी अपराध में दंड की राशी को घटा दें या फिर ख़त्म कर देना,किसी प्रकार की खरीदारी ,किसी कार्य करने की निविदा जारी करते समय सेवा प्रदाता या बिक्रेता को लाभ पहुंचा कर अपना लाभ प्राप्त करना इत्यादि मुख्य स्रोत है.
तृतीय ;इस स्रोत से जनित भ्रष्टाचार का कारण सरकारी कर्मचारी नहीं बल्कि जनता स्वयं जिम्मेवार होती है.जब कोई व्यक्ति सरकारी कार्यालय में जाकर अपनी आवश्यकतानुसार कार्य कराने ,या अपने पक्ष में गैर कानूनी कार्यों को कराने के लिए सरकारी कर्मी को लालच देता है,उससे सौदेबाजी करता है,कभी कभी अपनी ताकत की धमकी देता है यहाँ तक की जान से मारने की चेतावनी भी दे देता है. ऐसी परिस्थिति में अक्सर सरकारी कर्मी अपने लालच में नहीं अपनी सुरक्षा से चिंतित होते हुए भ्रष्टाचार को गले लगाता है.
सभी प्रकार के भ्रष्टाचार इन्ही स्रोतों से उत्पन्न होते है. अतः यदि भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना है तो उपरोक्त माध्यमो को समझना होगा और उसी के अनुरूप पारदर्शिता को बढ़ाना होगा .
--
*SATYA SHEEL AGRAWAL*
(blogger)*
प्रथम;सरकारी कर्मी,सरकारी अधिकारी अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए, उसे मिली निर्णय शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए, आपके सही काम को भी गलत सिद्ध करने की धमकी देता है, और उसके बदले में रिश्वत की मांग करता है,या फिर आपके काम को अनावश्यक रूप से देर करने बात करता है ,जल्दी काम करवाने के लिए सेवा पानी की जरूरत बताता है.इस प्रकार के भ्रष्टाचार में सरकारी खाजने को कोई हानि तो नहीं पहुँचती परन्तु आपकी जेब पर डाका पड़ता है और सही काम के लिए घूस देना आपके लिए कुछ ज्यादा ही कष्ट दायक होता है.क्योंकि आपको कानून सम्मत काम के लिए भी जेब ढीली करने की मजबूरी जो है.
द्वितीय ;इस स्रोत द्वारा आपकी जेब पर तो डाका डाला ही जाता है,परन्तु सरकारी राजकोष को भी क्षति पहुंचाईजाती है,अर्थात या राजस्व को आने से रोका जाता है या फिर राजस्व को आवश्यकता से अधिक खर्च कर राजकोष को नुकसान पहुँचाया जाता है.लाभान्वित होते हैं आप या सरकारी कर्मी.इस प्रकार के भ्रष्टाचार में सरकारी अधिकारी,सत्ताधारी नेता राजकोष को चूना लगाकर अपने खजाने भरते हैं.जनता की गाढ़ी कमाई से प्राप्त टेक्स को चंद लोग चाट कर जाते हैं.और जनता को विकास के नाम पर मिलता है सिर्फ आश्वासन .भ्रष्टाचार के इस स्रोत को विशालतम स्रोत कहा जा सकता है जिसके द्वारा हजारों करोड़ का फटका लगता है .जैसे किसी टैक्स की बसूली करते समय ताक्स्दाता को लाभ पहुँचाना,किसी अपराध में दंड की राशी को घटा दें या फिर ख़त्म कर देना,किसी प्रकार की खरीदारी ,किसी कार्य करने की निविदा जारी करते समय सेवा प्रदाता या बिक्रेता को लाभ पहुंचा कर अपना लाभ प्राप्त करना इत्यादि मुख्य स्रोत है.
तृतीय ;इस स्रोत से जनित भ्रष्टाचार का कारण सरकारी कर्मचारी नहीं बल्कि जनता स्वयं जिम्मेवार होती है.जब कोई व्यक्ति सरकारी कार्यालय में जाकर अपनी आवश्यकतानुसार कार्य कराने ,या अपने पक्ष में गैर कानूनी कार्यों को कराने के लिए सरकारी कर्मी को लालच देता है,उससे सौदेबाजी करता है,कभी कभी अपनी ताकत की धमकी देता है यहाँ तक की जान से मारने की चेतावनी भी दे देता है. ऐसी परिस्थिति में अक्सर सरकारी कर्मी अपने लालच में नहीं अपनी सुरक्षा से चिंतित होते हुए भ्रष्टाचार को गले लगाता है.
सभी प्रकार के भ्रष्टाचार इन्ही स्रोतों से उत्पन्न होते है. अतः यदि भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना है तो उपरोक्त माध्यमो को समझना होगा और उसी के अनुरूप पारदर्शिता को बढ़ाना होगा .
--
*SATYA SHEEL AGRAWAL*
(blogger)*
सोमवार, 12 सितंबर 2011
त्रिस्तरीय भ्रष्टाचार
आज श्री अन्ना हजारे और उनके सहयोगी दल अर्थात अन्ना टीम ने देश व्यापी आन्दोलन द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध,मुहीम चलायी है. देश का जन जन आकंठ डूबे भ्रष्टाचार से ग्रस्त है,आंदोलित है.भ्रष्टाचार पर बहस ,भ्रष्टाचार पर घर घर चर्चा,देश की समस्याओं का मुख्य मुद्दा बन गया है.
देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को मुख्यतः तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है. सर्व प्रथम सर्वोच्च स्तरीय भ्रष्टाचार जो विधायकों,सांसदों,मंत्रियों के स्तर पर किया जाता है. जहाँ सत्ता पर आसीन मंत्री किसी उद्योगपति,व्यापारी,कारोबारी से अथवा उनके समूह से अपनी पार्टी के लिए चंदा लेने के नाम पर मोटी रकम एंठ्ता है. ताकि स्वयं को तथा पार्टी के उम्मीदवारों को चुनावों में विजय दिलाने में मदद मिल सके. और वसूली गयी मोटी रकम के बदले में चंदा प्रदाता को अपने उत्पाद के मूल्य बढ़ने का अवसर दिया जाता है.जो अंततः जनता की जेब पर भारी पड़ता है. इसी स्तर पर अपनी ताकत का लाभ उठाते हुए घूस लेकर लाइसेंस जारी करना,विभिन्न सरकारी योजनाओं के कार्यों के कार्यान्वयन के लिए ठेकेदारों,सेवा प्रदाता एजेंसियों को लाभ पहुँचाना शामिल है. क्योंकि स्वयं मंत्री एवं नेता विभिन्न प्रकार से कमीशन लेते रहते है.,सरकरी नौकरशाहों पर नियंत्रण नहीं कर पाते. और जब बड़े बड़े अफसरों से स्थानान्तरण के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है,विभिन्न पदों की कमाई के अनुसर कीमत तय की जाती है तो बड़े बड़े अफसर बेलगाम एवं बेधड़क हो जाते हैं. अब तो सत्ता पक्ष के लोग अपहरण कर्ताओं,डकैतों भूमाफियाओं,खनन माफियाओं,नकली मॉल के निर्माताओं से मिल कर भी अपनी तिजोरियां भरने लगे हैं.
भ्रष्टाचार की द्वितीय श्रेणी में बड़े बड़े नौकर शाह ,जिनका सीधा सम्बन्ध मंत्रालयों से होता है, आते हैं.जो अपने मातहत अफसरों से ट्रांसफर ,प्रोमोशन जैसे अनेक कार्यों के लिए अपने अधिकारों की कीमत वसूल करते हैं.साथ ही उसका कुछ अंश अपने मंत्रियों को पहुंचा कर अपना भविष्य सुरक्षित कर लेते हैं.विभिन्न सरकारी योजनाओ के कार्यान्वयन के लिए आंवटित धनराशी का बड़ा हिस्सा स्वयं हड़पने के उपाय सोचता रहते हैं,ताकि सत्तापक्ष से लेकर नीचे का स्टाफ नोटों की बरसात का लाभ उठता रहे.
तृतीय श्रेणी के भ्रष्टाचार में जनता का सीधे सीधे दोहन किया जाता है. जनता की जेब से भ्रष्टाचार के रूप में वसूली गयी रकम पंक्तिबद्ध तरीके से ऊपर तक पहुँचती है. जनता इस श्रेणी के भ्रष्टाचार से सर्वाधिक त्रस्त होती है,जब उसे सरकरी विभाग में किसी भी कार्य को कराने के लिए घूस देनी पड़ती है. अर्थात ऑफिस में किसी फाइल को ढूंढ निकालने की कीमत,फाइल को अग्रसारित करने की कीमत ,बिल जमा करने के लिए अतिरिक्त राशी,लाइसेंस बनवाने,नवीकरण कराने,समयानुसार कराने के लिए घूस, अपना धन राजकोष से वापस लेने के लिए कमीशन,किसी प्रकार का सरकारी प्रमाण पत्र जारी कराने की कीमत, कोई सरकारी आदेश अपने पक्ष में कराने की कीमत, इत्यादि इत्यादि अर्थात प्रत्येक स्तर पर जनता को अपना काम कराने के लिए पैसे देने पड़ते हैं.सम्वेदन हीनता की हद तो जब हो जाती है जब किसी गंभीर रोगी को अस्पताल में भर्ती कराने की कीमत देनी पड़ती है,या फिर दुर्घटना में मारे गए अपने प्रिय जन का पोस्ट मार्टम शीघ्र कराने के लिए कीमत चुकानी पड़ती है.जनता को न चाहते हुए भी रिश्वत देने की मजबूरी बन जाती है.
यदि हजारे साहेब उपरोक्त पंक्ति में व्याप्त भ्रष्टाचार पर ही अंकुश लगा पाने में सफल हो पाए तो देश के हालत काफी सुधर सकते हैं,तत्पश्चात नीचे के अफसरों की रिश्वत लेते हुए रूह कंपेगी.
देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को मुख्यतः तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है. सर्व प्रथम सर्वोच्च स्तरीय भ्रष्टाचार जो विधायकों,सांसदों,मंत्रियों के स्तर पर किया जाता है. जहाँ सत्ता पर आसीन मंत्री किसी उद्योगपति,व्यापारी,कारोबारी से अथवा उनके समूह से अपनी पार्टी के लिए चंदा लेने के नाम पर मोटी रकम एंठ्ता है. ताकि स्वयं को तथा पार्टी के उम्मीदवारों को चुनावों में विजय दिलाने में मदद मिल सके. और वसूली गयी मोटी रकम के बदले में चंदा प्रदाता को अपने उत्पाद के मूल्य बढ़ने का अवसर दिया जाता है.जो अंततः जनता की जेब पर भारी पड़ता है. इसी स्तर पर अपनी ताकत का लाभ उठाते हुए घूस लेकर लाइसेंस जारी करना,विभिन्न सरकारी योजनाओं के कार्यों के कार्यान्वयन के लिए ठेकेदारों,सेवा प्रदाता एजेंसियों को लाभ पहुँचाना शामिल है. क्योंकि स्वयं मंत्री एवं नेता विभिन्न प्रकार से कमीशन लेते रहते है.,सरकरी नौकरशाहों पर नियंत्रण नहीं कर पाते. और जब बड़े बड़े अफसरों से स्थानान्तरण के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है,विभिन्न पदों की कमाई के अनुसर कीमत तय की जाती है तो बड़े बड़े अफसर बेलगाम एवं बेधड़क हो जाते हैं. अब तो सत्ता पक्ष के लोग अपहरण कर्ताओं,डकैतों भूमाफियाओं,खनन माफियाओं,नकली मॉल के निर्माताओं से मिल कर भी अपनी तिजोरियां भरने लगे हैं.
भ्रष्टाचार की द्वितीय श्रेणी में बड़े बड़े नौकर शाह ,जिनका सीधा सम्बन्ध मंत्रालयों से होता है, आते हैं.जो अपने मातहत अफसरों से ट्रांसफर ,प्रोमोशन जैसे अनेक कार्यों के लिए अपने अधिकारों की कीमत वसूल करते हैं.साथ ही उसका कुछ अंश अपने मंत्रियों को पहुंचा कर अपना भविष्य सुरक्षित कर लेते हैं.विभिन्न सरकारी योजनाओ के कार्यान्वयन के लिए आंवटित धनराशी का बड़ा हिस्सा स्वयं हड़पने के उपाय सोचता रहते हैं,ताकि सत्तापक्ष से लेकर नीचे का स्टाफ नोटों की बरसात का लाभ उठता रहे.
तृतीय श्रेणी के भ्रष्टाचार में जनता का सीधे सीधे दोहन किया जाता है. जनता की जेब से भ्रष्टाचार के रूप में वसूली गयी रकम पंक्तिबद्ध तरीके से ऊपर तक पहुँचती है. जनता इस श्रेणी के भ्रष्टाचार से सर्वाधिक त्रस्त होती है,जब उसे सरकरी विभाग में किसी भी कार्य को कराने के लिए घूस देनी पड़ती है. अर्थात ऑफिस में किसी फाइल को ढूंढ निकालने की कीमत,फाइल को अग्रसारित करने की कीमत ,बिल जमा करने के लिए अतिरिक्त राशी,लाइसेंस बनवाने,नवीकरण कराने,समयानुसार कराने के लिए घूस, अपना धन राजकोष से वापस लेने के लिए कमीशन,किसी प्रकार का सरकारी प्रमाण पत्र जारी कराने की कीमत, कोई सरकारी आदेश अपने पक्ष में कराने की कीमत, इत्यादि इत्यादि अर्थात प्रत्येक स्तर पर जनता को अपना काम कराने के लिए पैसे देने पड़ते हैं.सम्वेदन हीनता की हद तो जब हो जाती है जब किसी गंभीर रोगी को अस्पताल में भर्ती कराने की कीमत देनी पड़ती है,या फिर दुर्घटना में मारे गए अपने प्रिय जन का पोस्ट मार्टम शीघ्र कराने के लिए कीमत चुकानी पड़ती है.जनता को न चाहते हुए भी रिश्वत देने की मजबूरी बन जाती है.
यदि हजारे साहेब उपरोक्त पंक्ति में व्याप्त भ्रष्टाचार पर ही अंकुश लगा पाने में सफल हो पाए तो देश के हालत काफी सुधर सकते हैं,तत्पश्चात नीचे के अफसरों की रिश्वत लेते हुए रूह कंपेगी.
सदस्यता लें
संदेश (Atom)